धुंडने निकला हूँ अपने अक्स को...
दूर सपनो से कहीं आवाज की पहिचान को.....
मन समर्पित कर चूका हूँ
सेस यह जीवन समर्पित भी है अपना
पा के खुद को खोने को तैयार सब कुछ
धुंडने निकला हूँ अपने अक्स को....
दूर सपनो से कहीं आवाज की पहिचान को .......
तय किये है फासले मैंने कई
चल के अन गिनत राहों से.....
आके ठहरा हूँ यहाँ
धुंडने निकला हूँ अपने अक्स को ....
दूर सपनो से कहीं आवाज की पहिचान को ....
ध्रिड संकल्प हूँ एक दिन मिल्लूँगा उससे यहाँ
धुंडने निकला हूँ अपने अक्स को......
दूर सपनो से कहीं आवाज की पहिचान को ......
मंजिलें मुस्किल थी ....
ब्याकुल पाने को मन
रास्ते अन्जान नयें ....
आ मिले हो अब मुझे तुम साथ ले लो
हर कदम पर हर नया एक सक्स है
धुंडने निकला हूँ अपने अक्स को .....
दूर सपनो से कहीं आवाज की पहिचान को ........
मेरा गाँव
मेरे इस ब्लॉग की सबसे बड़ी मुख्य बात मेरे लिए ये है कि header में जो फोटो है मेरे**( गाँव)** की है .... यहाँ होते हुए भी अपने घर को हर रोज देखता हूँ ..........
Sunday, 18 July 2010
तुम......तुम.......सिर्फ........तुम...
सूर्य की पहली किरण के साथ ही
तुम्हारे क़दमों के पद चिहन भी
ओंस की बूंदों की मानिंद पल भर में ही मिट गए .........
सब कुछ याद बन के रहा गया
चंद लम्हों पहले हम तुम थे .............
चाँदनी रात में रात्रि का तीसरा पहर ........
सूनसान पार्क के बीचों बीच
बहते झरने की कल्कलाहट .........
रात के सन्नाटे को
दफ्न करने की कोसिस में
हमारे बीच की खामोसी को तोड़ती हुई......
कदम से कदम मिला रही थी .......
अर्थ हीन सब्दों के बुलबुले
मन में कभी उठते कभी मिटतेन
न तुम्हारे ओंठ हिलते न आँखे जवाब दे रही थी..
अंतर्मन में एक ध्वंद सा चल रहा था
हम जानते थे हम कभी नहीं मिलेंगे ..........
वक़्त के हर एक लम्हे को समेट
एक दूजे को समर्पित करके...
भविष्य के अंधकार में विलीन होना था हमें
कुछ भी तो शेष नहीं रहा ..
सूर्य की पहली किरण के साथ ही
तुम्हारे क़दमों के पद चिहन
ओंस की बूंदों की मानिंद पल भर में ही मिट गए ......
सब कुछ याद बन के रहा गया ........
तुम्हारे क़दमों के पद चिहन भी
ओंस की बूंदों की मानिंद पल भर में ही मिट गए .........
सब कुछ याद बन के रहा गया
चंद लम्हों पहले हम तुम थे .............
चाँदनी रात में रात्रि का तीसरा पहर ........
सूनसान पार्क के बीचों बीच
बहते झरने की कल्कलाहट .........
रात के सन्नाटे को
दफ्न करने की कोसिस में
हमारे बीच की खामोसी को तोड़ती हुई......
कदम से कदम मिला रही थी .......
अर्थ हीन सब्दों के बुलबुले
मन में कभी उठते कभी मिटतेन
न तुम्हारे ओंठ हिलते न आँखे जवाब दे रही थी..
अंतर्मन में एक ध्वंद सा चल रहा था
हम जानते थे हम कभी नहीं मिलेंगे ..........
वक़्त के हर एक लम्हे को समेट
एक दूजे को समर्पित करके...
भविष्य के अंधकार में विलीन होना था हमें
कुछ भी तो शेष नहीं रहा ..
सूर्य की पहली किरण के साथ ही
तुम्हारे क़दमों के पद चिहन
ओंस की बूंदों की मानिंद पल भर में ही मिट गए ......
सब कुछ याद बन के रहा गया ........
तुम मिले ....!!!
तुम मिले तो ये जाना .....
सारा जहाँ मिल गया ...........
ना सोचूं कुछ .......
पर ये मानु .....
की तुम मिले... सारा जहाँ मिल गया...............
इस बीरान जिंदगी में .......................
एक हंसी मिल गया ...........
धुन्ड़ता हूँ मैं .............
पूछता हूँ मैं............
हर किसी से .............
तेरा निसान ...............
जो मिल गया.....तू ना समझे ...........
ये मेरी बातें .........
पर कुछ यहाँ मिल गया.............
हें खामोश क्यों.......
ये लब्ज तेरे सुन दास्ताँ इस हाले दिल की ................
तेरा निशां मिल गया........
अब तू कहे ..........तू सोचता है.......
पर मैं कहूं सब कुछ यहाँ ....................
छोड़ो भी अब ............हो गया........जो हुआ ..............
तू मिल गया..........
तेरा निशां मिल गया....................
सारा जहाँ मिल गया ...........
ना सोचूं कुछ .......
पर ये मानु .....
की तुम मिले... सारा जहाँ मिल गया...............
इस बीरान जिंदगी में .......................
एक हंसी मिल गया ...........
धुन्ड़ता हूँ मैं .............
पूछता हूँ मैं............
हर किसी से .............
तेरा निसान ...............
जो मिल गया.....तू ना समझे ...........
ये मेरी बातें .........
पर कुछ यहाँ मिल गया.............
हें खामोश क्यों.......
ये लब्ज तेरे सुन दास्ताँ इस हाले दिल की ................
तेरा निशां मिल गया........
अब तू कहे ..........तू सोचता है.......
पर मैं कहूं सब कुछ यहाँ ....................
छोड़ो भी अब ............हो गया........जो हुआ ..............
तू मिल गया..........
तेरा निशां मिल गया....................
Thursday, 24 June 2010
मुझे आज भी याद है..........
वो उनके आने की आहट ने मुझे चोंका दियामुझे आज भी याद है..........................
उस लम्हे को अरसा गुजर गया
अर्थ हीन सब्दों को
पंक्तियों में पिरो कर
फिर बिखेरते .........
फिर पिरोते नए अर्थ की तलाश में
मुझे आज भी याद है ......................
फिर उनसे मुलाकात की चाह ने
मेरे सब्दों को नयी दिसा दी
मुझे आज भी याद है .....................
अब हर रोज
कुछ नया लिखने की कोशिस
अन गिनत सब्दों से भरे मन से
सब्दों को नया अर्थ दे कर
उन्हें पंक्तियों में पिरो कर उन्हें देना
मुझे आज भी याद है....................
वो उनके आने की आहात ने मुझे चोंका दिया
मुझे आज भी याद है.......................
नि भुल्यों मैं कुछ नि भुल्यों.........
गोंला गुठियारों मा व दोड़ा भागी
सागवाड़ों न व काकडी मुंगरी माल्टा की चोरी
नि भुल्यों मैं कुछ नि भुल्यों ................
छाजा डेनडाला मा उ लुका छुप्पी
माँ की खुगली माँ उ बेसुध से जाणू
नि भुल्यों मैं कुछ नि भुल्यों ................
फूलु का मैना मा
सारी-सारियों मा फूलेरू की टोली
वो हल्ला वो हुड़दंग उ खेलाणु-खिलानु
नि भुल्यों मैं कुछ नि भुल्यों ................
थोल आंदा त व मोंज व मस्ती
जेठ का मैना माँ काफुलू का पिछाड़ी
कई माँ सुणों व भामोरों की सैदा
भट्गाणु वों डंडों -डंडों
नि भुल्यों मैं कुछ नि भुल्यों ................
कभी काळी त कभी लाल हिसर
उ घिंगारू , किन्गोद
सारी सारयों वो पोथालों का घ्वाल
नि भुल्यों मैं कुछ नि भुल्यों ................
बस्गाल आंदा ही रोप्निओं की मार
वा सेरों की धान
फलेंडा की बार उ तिमलों कु स्वाद
नि भुल्यों मैं कुछ नि भुल्यों .........
कैमा मांगों उ बचपन का दिन
बाबा की वा प्यारी फटकार
माँ कु लाड़........
नि भुल्यों मैं कुछ नि भुल्यों ...............
सागवाड़ों न व काकडी मुंगरी माल्टा की चोरी
नि भुल्यों मैं कुछ नि भुल्यों ................
छाजा डेनडाला मा उ लुका छुप्पी
माँ की खुगली माँ उ बेसुध से जाणू
नि भुल्यों मैं कुछ नि भुल्यों ................
फूलु का मैना मा
सारी-सारियों मा फूलेरू की टोली
वो हल्ला वो हुड़दंग उ खेलाणु-खिलानु
नि भुल्यों मैं कुछ नि भुल्यों ................
थोल आंदा त व मोंज व मस्ती
जेठ का मैना माँ काफुलू का पिछाड़ी
कई माँ सुणों व भामोरों की सैदा
भट्गाणु वों डंडों -डंडों
नि भुल्यों मैं कुछ नि भुल्यों ................
कभी काळी त कभी लाल हिसर
उ घिंगारू , किन्गोद
सारी सारयों वो पोथालों का घ्वाल
नि भुल्यों मैं कुछ नि भुल्यों ................
बस्गाल आंदा ही रोप्निओं की मार
वा सेरों की धान
फलेंडा की बार उ तिमलों कु स्वाद
नि भुल्यों मैं कुछ नि भुल्यों .........
कैमा मांगों उ बचपन का दिन
बाबा की वा प्यारी फटकार
माँ कु लाड़........
नि भुल्यों मैं कुछ नि भुल्यों ...............
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